ज्योतिष के कुछ विशेष नियम

1. जब मनुष्य से नौकरी छिन जाए, घरबार छूट जाए, स्त्री का त्याग हो जाए, भोग-विलास का त्याग हो जाए तो ऐसे त्याग अथवा अलगाव के पीछे अक्सर अलगावदी ग्रहों का प्रभाव रहता है।

राहु, शनि तथा सूर्य में से दो अथवा तीन ग्रह जिस भाव, ग्रह आदि पर अपना प्रभाव डालें मनुष्य उन भावादि से अवश्य अलग हो जाता है, जैसे राहु तथा शनि का प्रभाव दशम भाव (तथा दशमेश) पर हो तो मनुष्य

को नौकरी से हाथ धोना पड़ता है।

2. ग्रह अपना फल तो करते हैं, परन्तु वे जब ऐसी स्थिति में हों कि उनकी राशि में कोई ग्रह हो तो वे उस ग्रह का भी फल अवश्य करते हैं।

जैसे धनु राशि में मंगल हो तो अब धनु राशि के स्वामी गुरु में बहुत हद तक मंगल का स्वभाव काम करेगा और गुरु की दृष्टि अथवा योग गुरु की दृष्टि अथवा योग न रहकर मंगल की युति अथवा दृष्टि का योग बन जाएगा । ऐसी स्थिति में फल का भिन्न हो जाना स्वाभाविक तथा अनिवार्य है ।

3. राहु तथा केतु अधिष्ठित राशि के स्वामी का प्रभाव जहां भी युति अथवा दृष्टि द्वारा पड़ रहा हो उस प्रभाव में राहु अथवा केतु का क्रमशः स्वभाव रहता है, अर्थात् राहु का स्वामी शनि बन रोग, पृथकता, विलम्ब, अड़चन आदि उत्पन्न करेगा और केतु का स्वामी मंगल बन अग्निकाण्ड, चोट, चोरी, मारना आदि घटनाओं को घटित करेगा, चाहे वह ग्रह गुरु जैसा नैसर्गिक शुभग्रह ही क्यों न हो।

अतः गुरु आदि शुभ ग्रह की दृष्टि पर विचार करते समय इस बात पर भी विचार कर लेना चाहिए कि कहीं ये शुभ ग्रह राहु अथवा केतु अधिष्ठित राशि के स्वामी तो नहीं हैं

4. राहु तथा केतु जिन ग्रहों के साथ स्थित हों उनका प्रभाव भी राहु-केतु की दृष्टि में रहता है क्योंकि ये ग्रह छाया ग्रह हैं और अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखते ।

5.

  • गुरु, बुध, चन्द्र तथा शुक्र नैसर्गिक शुभ ग्रह हैं।
  • सूर्य पापी नहीं, परन्तु क्रूर ग्रह है।
  • मंगल, शनि, राहु तथा केतु नैसर्गिक पापी ग्रह हैं।

बुध तथा चन्द्र की शुभता स्थिति के अनुसार बदलती रहती है।

  • बुध तो यदि अकेला हो तो शुभ, शुभ ग्रहों के साथ हो तो भी शुभ, परन्तु पापी ग्रहों के साथ हो तो पापी बन जाता है ।
  • चन्द्र जितना ही सूर्य के समीप हो उतना निर्बल और जितना सूर्य से दूर हो उतना ही बलवान् हो जाता है।

सूर्य के 6 तिथि इस ओर शुक्ल पक्ष में तथा 6 तिथि उस ओर कृष्ण पक्ष में चन्द्र क्षीण बली माना जाता है, तब इसका प्रभाव पाप ग्रहों जैसा हो जाता है।

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चन्द्र के सम्बन्ध में एक और बात याद रखने की यह है कि चन्द्र सूर्य के समीप होता हुआ भी बलवान् समझा जाएगा यदि सूर्य स्वयं निर्बल हो

जैसे सूर्य तुला राशि के चतुर्थ स्थान में हो और चन्द्र वृश्चिक राशि द्वितीय तिथि का पंचम भाव में तो भी चन्द्र बलवान समझा जाएगा। क्योंकि यहां सूर्य स्वयं तुला राशि में भी निर्बल है और चतुर्थ केन्द्र में भी दिक् बल को खोकर निर्बल है।

6. जो भाव अपने स्वामी द्वारा दृष्ट हो तथा उस भाव पर शुभ दृष्टि भी हो तो स्वामी द्वारा दृष्ट भाव की बहुत वृद्धि होती है। जैसे तुला राशि में मंगल पंचम स्थान में पड़ा हो और गुरु द्वादश स्थान अथवा सप्तम स्थान में हो तो मंगल की दृष्टि अपनी निज राशि मेष पर पड़ेगी और मेष अथवा मंगल शुभ दृष्ट भी होंगे तो ऐसी स्थिति में एकादश भाव से सम्बद्ध लाभ बहुत बढ़ जाएगा ।

परन्तु यह मंगल की दृष्टि लाभ भाव द्वारा प्रदर्शित बड़े भाई के जीवन के लिए हानिकारक ही रहेगी अर्थात् कुण्डली वाले के बड़े भाई के अल्पायु होने तथा अल्प संख्या में होन का अनिष्ट बना रहेगा।

दूसरे शब्दों में उक्त सिद्धान्त का लाभ धन के क्षेत्र में है न कि जीवन के क्षेत्र में।

7. वक्री ग्रह विशेष बलवान् हो जाता है । उदाहरण के लिए यदि वृश्चिक लग्न हो और पुत्र भाव का स्वामी गुरु द्वादश अनिष्ट स्थान में अनिष्ट शत्रु राशि तुला में भी हो, परन्तु यदि वक्री है तो कम से कम दो पुत्र अवश्य देगा ।

8. शुक्र द्वादश स्थान में बहुत प्रसन्न रहता है क्योंकि शुक्र एक भोगात्मक ग्रह है और द्वादश स्थान भोग का स्थान है। अतः शुक्र जिसकी कुण्डली में द्वादश स्थान में होता है वह बहुधा स्त्री सुख वाला, भोगी रहता है। इसी प्रकार शुक्र छठे स्थान में भी धन सम्बन्धी शुभ फल ही देता है । परंतु ऐसा शुक्र शनि की राशियों में नही होना चाहिये।

9. किसी ग्रह से अथवा भाव से कोई ग्रह दशम स्थान में स्थित हो तो समझना चाहिए कि पूर्वोक्त ग्रह पर दशमस्थ ग्रह का प्रभाव है। इसे आप केन्द्र प्रभाव भी कह सकते हैं।

जैसे पंचम भाव में गुरु हो और द्वितीय भाव में शनि तो यद्यपि शनि की दृष्टि गुरु पर नहीं पड़ रही तथापि गुरु पर शनि का उतना ही प्रभाव माना जायेगा जितना कि शनि की दृष्टि का ।

10. जब किसी शुभ भाव (लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम, दशम) का स्वामी नीच राशि में पड़ा हो, परन्तु उसको नीच भंग प्राप्त हो तो नीचता के भंग का फल उस भाव के लिए जिसका कि वह नीच ग्रह स्वामी है अतीव शुभ होता है।

जैसे सिंह लग्न हो और सूर्य तृतीय भाव में तुला राशि का नीच होकर नीच भंग को प्राप्त हो तो लग्न के लिए जिसका कि सूर्य स्वामी है अतीव शुभ होगा अर्थात् उच्च पदवी, राज्य, शासन, धन, स्वास्थ्य, यश, पदवी आदि विशेष रूप से प्रदान करेगा।

फलित सूत्र

  1.  ज्योतिष के कुछ विशेष नियम
  2.  ग्रह परिचय
  3.  कुंडली के पहले भाव का महत्व
  4.  कुंडली के दूसरे भाव का महत्व
  5.  कुंडली के तीसरे भाव का महत्व
  6.  कुंडली के चौथे भाव का महत्व
  7.  कुंडली के पॉचवें भाव का महत्व
  8.  कुंडली के छठे भाव का महत्व
  9.  कुंडली के सातवें भाव का महत्व
  10.  कुंडली के आठवें भाव का महत्व
  11.  कुंडली के नौवें भाव का महत्व
  12.   कुंडली के दसवें भाव का महत्व
  13.  कुंडली के ग्यारहवें भाव का महत्व
  14.  कुंडली के बरहवें भाव का महत्व
  15.  दशाफल कहने के नियम

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